सरकार शायद अंत्योदय के पथ
पर...........................................
आजादी के सत्तर साल बाद भी
कितनों को निष्पक्ष मौके मिलते ही नही ? कहना
आसान है प्रतिभा छुपती नही, पर सच्चाई कुछ और ही
है......
हिन्दी से प्रेम करने वाले
सभी लोगो को ज्ञात है विश्व हिन्दी सम्मेलन हर 3
वर्ष के अंतराल के बाद पोर्ट लुई, मॉरिशस मे होने वाला है।
पर इस बार होने वाले विश्व
हिन्दी सम्मेलन और भारत मे घटित कई ऐसे घटनाक्रम हुए जिसका उल्लेख करते हुए मुझे
गर्व हो रहा है कि हम भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली मे विश्ववास रखते है ओर
अंत्योदय ही हमारा लक्ष्य है । तभी तो बिजनौर के एक छोटे से गाँव से निकली प्रतिभा
इस कार्यक्रम का हिस्सा है नाम है राहुल।
सम्मान होगा उसका जो
वास्तव मे योग्य है, देर से सही पर देश शायद सही दिशा मे चल पड़ा है
तभी तो उत्क्रष्ट सांसद का सम्मान मिलता है एक गरीब माँ के बेटे ओर पिछड़े श्री
हुकुम देव नारायण यादव को । मेरे अनुरोध है उत्क्रष्ट सांसद बनने के बाद जो
वक्तव्य श्री हुकुमदेव नारायण यादव जी ने दिया वो अवश्य देखे ओर सुने, तो अहसास होगा हम किस युग से आए, कहाँ से निकले, एक एक शब्द बोला जा रहा था पर अन्तर्मन रो रहा था। सैटिंग के जमाने मे
निस्पक्षता संदेह तो होता ही है,उनकी वाणी के वे शब्द
धन्यवाद कर रहे उन गरीब पिछड़े, या जिनको हम ज्यादा पढे
लिखे लोग दोयम मानते है, उनकी ओर से ओर कह रहे है मौका
तो दो ..... अरे अरे .......हम भी किसी से कम नही।
अंत्योदय कि सच्ची
परिकल्पना है पदम श्री सम्मान मिलना दामोदर गणेश बापट जी को जिन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया समाज के लिये चांपा से आठ किलोमीटर दूर ग्राम सोठी में एक आश्रम में कुष्ठ पीड़ितों की सेवा मे ही निकाल दिया । कुष्ठ आश्रम की स्थापना सन 1962 में कुष्ठ
पीड़ित सदाशिवराव गोविंदराव कात्रे ने की थी। वहां वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता
बापट सन 1972 में पहुंचे और कात्रे जी के साथ
मिलकर उन्होंने कुष्ठ पीड़ितों के इलाज और उनके सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास के लिए
सेवा के अनेक प्रकल्पों की शुरूआत की।
पदम
श्री सम्मान मिला बाबा योगेंद्र जी को 1924 मे जन्मे बाबा योगेन्द्र के सर से 2
वर्ष की आयु मे माँ का साया उठ गया। पड़ोस मे एक परिवार को बेच दिया, मान्यता थी कि इससे बच्चा दीर्घायु होगा ।
उस माँ ने दस वर्ष तक पाला फिर लग गए समाज साधने कितने कलाकारो को मंच दिया ।
वास्तव
मे इन सभी अलकरणों, पुरस्कारों से ऐसे लोग
सम्मानित नही होते, ये पुरस्कार सम्मानित हुए है ।
सरकार को धन्यवाद देता हूँ और उससे भी ज्यादा सम्मान के पात्र वह है जो इन
शिल्पियों का सम्मान कर रहे है ओर योग्य को सम्मानित कर रहे है।
मौके
दे रहे है उनको जिनके पास न कोई आका (गॉड फादर) है, न चापलूसी
पर कर्म का सिद्धांत है।
शिव
मंगल सिंह “ सुमन” कि ये पंक्तिया उचित ही है ......
“क्या
हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।“
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।“
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विकास
कुमार